समय चक्र

रविवार, 1 मई 2011


                                                           पिता क्या है ?

 मैं कवि बनके रवि पर लिख दूंगा, ये तो मेरी कीमत  है !
पर उन पिता पर क्या छंद लिखूंगा,जोकि मेरी हिम्मत है!!  
उन पिता के यशोगान को मेरी ये वाणी भोंटी है !
और लिखने को उनके कीर्तिमान को ये धरती भी छोटी है!!

 
 जिनकी अंगुली पकड़ के, मैंने जाना हर पगडण्डी को !
जिनकी शॉल के बूते ललकारा, मैंने भीषण ठंडी को !! जिनके अनुशासन से, हम वैभव के विस्तार हुए!
जिनकी आँखों के सपनो से, हम इस भांति साकार हुए !!

 

 जब से मैंने जग को जाना, वे ही तो परिचायक है!
वे ही सबल प्रेरक है, हीरो है,  मेरे नायक है!!

वे दूर हो तो भी लगता है- जैसे पास हो, यहीं-कहीं है!
पिता क्या है? ये उनसे पूछो जिनके सिर पे पिता नहीं है!!

8 टिप्‍पणियां:

  1. वे दूर हो तो भी लगता है- जैसे पास हो, यहीं-कहीं है!
    पिता क्या है? ये उनसे पूछो जिनके सिर पे पिता नहीं है!!
    bahut sundar v sateek bat kahi hai aapne .aabhar .

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  2. धन्यवाद शिखा...मेरे विनम्र विचार से वो कविता कोरी तुकबंदी है जो मन को नहीं छू जाये..मंच पे काव्यपाठ करना आज जुगत का उत्सव हो चुका है ...आप यकीं नहीं कर पाएंगी की मंच में काव्यपाठ करने के लिए एक मोटे निवेश की दरकार होती है...ऐसे में स्वांत सुखाय: मेरे द्वारा लिखा जा रहा ये ब्लॉग आप को कही अपनी बात कहते लगे तो मैं अपने प्रयास की सफलता समझूंगा...योगी.

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  3. जिनकी अंगुली पकड़ के, मैंने जाना हर पगडण्डी को !
    जिनकी शॉल के बूते ललकारा, मैंने भीषण ठंडी को !! जिनके अनुशासन से, हम वैभव के विस्तार हुए!
    जिनकी आँखों के सपनो से, हम इस भांति साकार हुए !!
    yogesh ji aapne pita ke prati apne man ke bhavon ko bahut khoobsoorati se shabdon me utara hai.ek ek shabd anmol hai aur kavita sahejne yogya hai.

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  4. "वे दूर हो तो भी लगता है- जैसे पास हो, यहीं-कहीं है!"--सुन्दर भाव...बधाई ..
    ---योगी जी आपका यह कथन..""वो कविता कोरी तुकबंदी है जो मन को नहीं छू जाये..मंच पे काव्यपाठ करना आज जुगत का उत्सव हो चुका है "". ..एक दम सत्य है ....
    ----परन्तु इसके साथ यह भी सच है कि..स्वर्ण सदा स्वर्ण ही है चाहे सिक्के की या सिल्ली की या अनगढ़ रवे की शक्ल में हो...परन्तु आभूषण बनकर उसका सौंदर्य द्विगुणित होजाता है ...हीरे आदि से और अधिक बढ़ जाता है....कामिनी के तन पर अगणित हो जाता है...कवि ह्रदय हैं तो समझ गए होंगे....
    --उत्सव व मंच की चिंता किये बिना ...काव्य-कला में सतत निखार लाने का प्रयत्न करें....

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  5. shalini ji...Dr.gupta sir...आपके ब्लॉग पे पधारने और रचना पसंद करने हेतु धन्यवाद् सादर प्रेषित है...

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